आरज़ू-ए-इश्क़
नहीं नुस्खा कोई यारों गम-ए-दिल को दबाने का,
कोई दरिया नहीं दबता दबाने से मचल आये।
गया था सांझ दरिया पर बदन से जां छुड़ाने को,
वहीं देखा उसे रोते इरादा हम बदल आये।
तुम्हारी याद का कोई मुकम्मल वक्त तो तय हो,
भजन लिखने जो बैठा था भजन छूटा ग़ज़ल आये।
उसे इस बात पर हमसे अदावत है हम कैसे,
भरी महफिल से बिना बहके बिना फिसले निकल आये।
ज़रा धीरे चलो सांसो दिवाना एक है सजदे में,
तुम्हारे आने जाने से सजदे में खलल आये।
न जाने कौन मिट्टी से बनाते हो ग़ज़ल शक्ति,
हज़ारों नुक्स है फिर भी गुलाबों की महक आये।
✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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