लीला गिरधर की


नमस्कार मित्रों

इतिहास की कोख से फिर एक मनोहर पौराणिक कथा आप सभी को सुनाने आया हूं 

कथा इस प्रकार है तो कि नरकासुर के वध के लिए गए श्रीकृष्ण ने कैसे माया रची इस चित्र को देखिए युद्ध का चित्रण बड़े सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है।



 नरकासुर के छोड़े अस्त्र को भेदकर दूसरा वार करने के लिए तैयार सत्यभामा के भावों को देखकर लगता है यह वार निर्णायक होगा। सत्यभामा दिखने में जितनी सुंदर है युद्धकला में उतनी ही निपुण भी है। 


और जरा श्रीकृष्ण को तो देखिए, नीचे गरुड़ पर बैठे है। बाण छोड़ने के बाद झटका लगने से सत्यभामा का संतुलन न बिगड़े इसलिए अपने पैर से सत्यभामा का पिछला पैर लगा रखा है। 


श्रीकृष्ण के हाथ में विश्व का सबसे अचूक मारक अस्त्र सुदर्शन चक्र है। किंतु जब पत्नी युद्ध कर रही है, कृष्ण स्वयं आड़ लेकर बैठे है और पत्नी के युद्ध कौशल को देखकर श्रीकृष्ण बलिहारी है, उसे कौतुक से देख रहे है। 


सनातन के इतर विश्व के किसी पंथ, संप्रदाय, विचारधारा में नारीवाद के ऐसे मुक्त विचार का उदाहरण नहीं मिलता जहाँ स्त्री पुरुष स्वतंत्र भी है और परस्पर पूरक भी! जहाँ नारी व्यक्तित्व भी है, व्यक्ति भी! जहाँ पुरुष स्त्री की स्वतंत्रता से विस्मित भी है और उसका आधार भी! कितना सुंदर विचार! कैसा अद्भुत दर्शन! कैसा अद्वैत! कितना अद्भुत आध्यत्म!

सोचिए समझिए और गर्व कीजिए अपनी संस्कृति।

धन्यवाद जय श्री राम 



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