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आरज़ू-ए-इश्क़

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 नहीं नुस्खा कोई यारों गम-ए-दिल को दबाने का, कोई दरिया नहीं दबता दबाने से मचल आये। गया था सांझ दरिया पर बदन से जां छुड़ाने को, वहीं देखा उसे रोते इरादा हम बदल आये। तुम्हारी याद का कोई मुकम्मल वक्त तो तय हो, भजन लिखने जो बैठा था भजन छूटा ग़ज़ल आये। उसे इस बात पर हमसे अदावत है हम कैसे, भरी महफिल से बिना बहके बिना फिसले निकल आये। ज़रा धीरे चलो सांसो दिवाना एक है सजदे में, तुम्हारे आने जाने से सजदे में खलल आये। न जाने कौन मिट्टी से बनाते हो ग़ज़ल शक्ति, हज़ारों नुक्स है फिर भी गुलाबों की महक आये। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

🌳जो चाहोगे सो पाओगे 🌳

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    एक साधु था, वह प्रतिदिन घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीं देता था और सब उसे एक पागल साधु समझते थे।  एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा- “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं चाहता हूँ?” साधु उसकी बात को सुनकर बोला- “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैं उसे अवश्य दूंगा, बस तुम्हें मेरी बात माननी होगी। किन्तु पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला- “मेरी एक ही इच्छा है की मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ।” साधू बोला, “कोई बात नहीं, मैं तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ युवक की हथेली पर रखते हुए कहा, “पुत्र, मैं तुम्हें दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इस...

🌳 श्रीकृष्ण, गोपियाँ एवं अगस्त ऋषि 🌳

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            एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा कि, ‘हे कृष्ण हमे यमुना पार अगस्त् ऋषि जी को भोजन कराने जाना है, और यमुना जी में बाढ़ आई हुई जल बहुत अधिक है | अब आप  बताओ हम कैसे जाएं? भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों से कहा कि, तुम यमुना जी के समीप जाओ और उनसे कहना कि, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण पूर्ण ब्रह्मचारी है तो हमें उस पार जाने के लिए मार्ग दो | गोपियाँ हंसने लगी कि, लो 16 हज़ार 108 पत्नियों वाले ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमते थे, हमे छेड़ते थे..कभी हमारे वस्त्र चुराते थे कभी मटकिया फोड़ते थे…चलो ये भी बोल के देख लेते हैं | गोपियाँ यमुना जी के समीप जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण पूर्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दें, और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया | गोपियाँ तो सन्न रह गई ये क्या हुआ ? कृष्ण ब्रह्मचारी ? !!! अब गोपियां अगस्त् ऋषि को भोजन करवा कर वापस आने लगी तो उन्होंने अगस्त् ऋषि से कहा कि, अब हम घर कैसे जाएं ? यमुनाजी बीच में है | अगस्त ऋषि ने पूछा इस पार कैसे पहुंची..? गोपियों...

🌳 भोगे बिना छुटकारा नहीं (बोध कथा) 🌳

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है  अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। शंख और लिखित दो सगे भाई थे। दोनो ने साथ मे गुरु और माता-पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी, पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी।  उन्होंने कई वर्षों के अध्ययन, चिंतन, अन्वेषण, मनन, के पश्चात जाना था, कि दुनिया में सबसे बड़ा काम जो मनुष्य के करने का है वह यह है कि, अपनी आत्मा का उद्धार करें।  वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद, तपस्या करने लगे। पास पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुंदर और सुविधाजनक बन गया था। दोनों भाई अपनी-अपनी तपोभूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते जुलते।  एक दिन लिखित भूखे थे। भाई के आश्रम में गए और वहां से कुछ फल तोड़ लाए। उन्हें खा ही रहे थे कि शंख वहां आ पहुंचे। उन्होंने पूछा- यह फल तुम कहां से लाए? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया- तुम्हारे आश्रम से।  शंख यह सुनकर बड़े दुखी हुए। फल  कोई बहुत मूल्यवान वस्तु नही थी। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे, किंतु चोरी स...

🌳 माँ के प्रेम की पराकाष्ठा 🌳

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गाँव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे। तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया। सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे। आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी। पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे। उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था। एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया - गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से...

🌳 ऊँची उड़ान 🌳

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गिद्धगिद्धों का एक झुण्ड खाने की तलाश में भटक रहा था। उड़ते – उड़ते वे एक टापू पे पहुँच गए। वो जगह उनके लिए स्वर्ग के समान थी। हर तरफ खाने के लिए मेंढक, मछलियाँ और समुद्री जीव मौजूद थे और इससे भी बड़ी बात ये थी कि वहां इन गिद्धों का शिकार करने वाला कोई जंगली जानवर नहीं था और वे बिना किसी भय के वहां रह सकते थे। युवा गिद्ध  कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे, उनमे से एक बोला, ” वाह ! मजा आ गया, अब तो मैं यहाँ से कहीं नहीं जाने वाला, यहाँ तो बिना किसी मेहनत के ही हमें बैठे -बैठे खाने को मिल रहा है!” बाकी गिद्ध भी उसकी हाँ में हाँ मिला ख़ुशी से झूमने लगे। सबके दिन मौज -मस्ती में बीत रहे थे लेकिन झुण्ड का सबसे बूढ़ा गिद्ध इससे खुश नहीं था। एक दिन अपनी चिंता जाहिर करते हुए वो बोला, ” भाइयों, हम गिद्ध हैं, हमें हमारी ऊँची उड़ान और अचूक वार करने की ताकत के लिए जाना जाता है। पर जबसे हम यहाँ आये हैं हर कोई आराम तलब हो गया है …ऊँची उड़ान तो दूर ज्यादातर गिद्ध तो कई महीनो से उड़े तक नहीं हैं…और आसानी से मिलने वाले भोजन की वजह से अब हम सब शिकार करना भी भूल रहे हैं … ये हमारे भविष्य के लिए अच्छा नहीं है …मैंने फ...

🌳 बद्रीनाथ धाम कथा 🌳

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एक बार श्री हरि (विष्णु) के मन में एक घोर तपस्या करने की इच्छा जाग्रत हुई। वे उचित जगह की तलाश में इधर उधर भटकने लगे। खोजते खोजते उन्हें एक जगह तप के लिए सबसे अच्छी लगी जो केदार भूमि के समीप नीलकंठ पर्वत के करीब थी। यह जगह उन्हें शांत, अनुकूल और अति प्रिय लगी। वे जानते थे की यह जगह शिव स्थली है अत: उनकी आज्ञा ली जाये और यह आज्ञा एक रोता हुआ बालक ले तो भोले बाबा तनिक भी माना नहीं कर सकते है। उन्होंने बालक के रूप में इस धरा पर अवतरण लिए और रोने लगे। उनकी यह दशा माँ पार्वती से देखी नही गयी और वे शिवजी के साथ उस बालक के समक्ष उपस्थित होकर उनके रोने का कारण पूछने लगे। बालक विष्णु ने बताया की उन्हें तप करना है और इसलिए उन्हें यह जगह चाहिए। भगवान शिव और पार्वती ने उन्हें वो जगह दे दी और बालक घोर तपस्या में लीन हो गया। तपस्या करते करते कई साल बीतने लगे और भारी हिमपात होने से बालक विष्णु बर्फ से पूरी तरह ढक चुके थे, पर उन्हें इस बात का कुछ भी पता नहीं था। बैकुंठ धाम से माँ लक्ष्मी से अपने पति की यह हालत देखी नही जा रही थी। उनका मन पीड़ा से दर्वित हो गया था। अपने पति की मुश्किलो को कम करने के लिए...